Thursday, 1 December 2016

रहस्यमयी अंतरिक्ष की खोज

नमस्ते दोस्तों ! मेरा नाम अमृत वर्मा है मैं एक "Thought Experimenter" हूँ। (Thought Experiment का अर्थ है सोच के आधार पर प्रयोग करना) मैंनें Thought Experiment के आधार पर अंतरिक्ष की रहस्यमयी पहलुओं की खोज करने की कोशिश की है। इस लेख में मैंनें अब तक की गयी अपनी सभी खोजों को साझा किया है। मैं खगोलशास्त्र के क्षेत्र में हो रही तरक्की में अपना योगदान देना चाहता हूँ। आप भी मेरा सहयोग कर सकते हैं सिर्फ मेरे इस ज्ञानवर्धक लेख को दूसरों तक पहुँचा कर। इस लेख को शेयर करें या इस छोटे से लिंक को कॉपी-पेस्ट करें :
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समय

Sand Watch
समय : रहस्यमयी अंतरिक्ष की खोज
समय क्या है? समय का सबसे छोटा पैमाना क्या है? हम अपने आस पास चीजों को हिलता देखते हैं ये समय का बदलना है, यदि हम समय को रोक दें तो हमें एक तस्वीर प्राप्त होगी। इसे हम एक फ्रेम (Frame) भी कह सकते हैं। एक फ्रेम समय का सबसे छोटा पैमाना होता है।हमारे आस पास प्रति सेकण्ड करोङों फ्रेम्स एक के बाद एक बदलते रहते हैं। जिससे हमें एक चलचित्र (Video) जैसा दृश्य देखने को मिलता है। इसी प्रकार समय आगे बढता है।

परमाणु कक्षिका

atom chamber
परमाणु कक्षिका : रहस्यमयी अंतरिक्ष की खोज

चीज़ें जब हिलती हैं तो उसके सभी परमाणु अपने वर्तमान स्थान को त्याग कर नये स्थान पर उपस्थित हो जाते हैं। मगर इसके लिए माध्यम की आवश्यकता होती है। हमारे सम्पूर्ण ब्रह्मांड में हर जगह अदृश्य खोखले ग्लोब मौजूद हैं जिनमें से पदार्थ के परमाणु होके गुज़रते हैं। इनको परमाणु कक्षिका कहते हैं। सभी परमाणु कक्षिकाऍ एक-दूसरे से जुङी होती हैं। प्रकाश वस्तु से टकरा कर हमारी ऑखों पर पङती है,जिससे हमें वस्तु दिखाई देती हैं। परन्तु प्रकाश कक्षिका से टकराने के बजाय उनमें से हो के गुज़रती हैं जिससे परमाणु कक्षिकाएं हमें दिखाई नहीं देतीं। समय के एक फ्रेम में एक परमाणु कक्षिका में एक से ज़्यादा परमाणु नहीं हो सकतें। सभी पदार्थ परमाणु से ही मिलकर बने होते हैं। जब किसी चीज़ पर बाहरी बल लगाया जाता है तो समय के अगले फ्रेम में वस्तु के सभी परमाणु लगाए गये बल की दिशा में मौजूद सबसे नजदीकी परमाणु कक्षिका में ही प्रवेश करते हैं। पदार्थ के परमाणु लगातार दो या दो से ज़्यादा फ्रेम तक एक ही कक्षिका में उपस्थित रह सकते हैं। कोई परमाणु अपने नजदीकी कक्षिका में प्रवेश किए बिना उसके अगले कक्षिका में उपस्थित नहीं हो सकता। यदि कोई परमाणु अपनी कक्षिका को त्यागने के बाद भी अगले फ्रेम में अपने किसी नजदीकी कक्षिका में उपस्थित नहीं होता है तो वो अपने ब्रह्मांड के किसी अन्य परमाणु कक्षिका में उपस्थित नहीं होगा। ब्रह्मांड में परमाणु कक्षिकाओं की मौजूदगी के कारण ही परमाणु आपस में सदैव निश्चित कोण पर ही जुड़ते हैं।
"एक सेकण्ड में कितने फ्रेम्स होते हैं ?"
यह ग्यात करने के लिए हमें एक परमाणु कक्षिका का व्यास तथा प्रकाश द्वारा एक सेकण्ड में तय की गयी सटीक दूरी ग्यात करनी होगी फिर परमाणु कक्षिका के व्यास की लम्बाई को एक सेकण्ड में तय किए गए प्रकाश की दूरी में भाग देने पर जो संख्या प्राप्त होगी, वह फ्रेम्स प्रति सेकण्ड की संख्या होगी।

ब्रह्माण्ड का निर्माण

Universe
ब्रह्माण्ड का निर्माण : रहस्यमयी अंतरिक्ष की खोज

रहस्य से भरे इस अंतरिक्ष में हमारे ब्रह्माण्ड के अलावा भी दूसरे बहुत सारे ब्रह्माण्ड है। सभी ब्रम्हांड में बहुत  सारे ब्लैक होल्स होते हैँ। ब्लैक होल बहुत सघन होता है। इसका द्रव्यमान इतना ज्यादा होता है कि उसके गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र मेँ आने पर प्रकाश भी इसकी तरफ खींच जाता है। प्रत्येक ब्रम्हांड किसी दूसरे ब्राम्हण के ब्लैक होल से बने होते हैँ मान लीजिए किसी ब्रम्हांड मेँ एक ब्लैक होल मौजूद है। इसकी अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण इसके परमाणु समेत परमाणु कक्षिकाएँ केंद्र मेँ खिंच रही हैं। जब यह खिंचाव हद से ज्यादा हो जाता है तो ब्लैक होल के चारोँ तरफ की परमाणु कक्षाएँ अपने से जुड़े हुए दूसरी परमाणु कक्षिकाओं से टूटकर अलग हो जाती है। और इस प्रकार ब्लैक होल अपने ब्रम्हांड से अलग हो जाता है जहाँ ना कोई दूसरा ब्रम्हांड है और ना ही दूसरी परमाणु कक्षिकाऍ।
ब्लैक होल की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से उसके साथ अब भी मौजूद चारोँ तरफ की कुछ कक्षिकाऍ बेहद तेजी से ब्लैक होल के केंद्र मेँ सिकुड़ने लगती है। चूँकि पदार्थोँ को मौजूद रहने के लिए परमाणु कक्षिका की आवश्यकता होती है इसलिए कक्षिकाओं के सिकुड़ने के साथ ही ब्लैक होल भी सिकुङ कर समय के एक बेहद छोटे हिस्से के लिए एक छोटे से गोले के रुप मेँ आ जाता है जिसका व्यास 1 से 2 इंच तक होता है। फिर इसमेँ जोरदार धमाका होता है जिसे बिग बैंग नाम दिया जा चुका है क्योंकि यह ब्लैक होल अपने ब्रंहांड से अलग हो चुका होता है इसलिए इस से निकला मलवा ब्रम्हांड मेँ नहीँ फैलता धमाके के बाद उस गोले से सबसे पहले प्रकाश अपना कदम बाहर रखता है हर दिशा मेँ प्रकाश परमाणु कक्षिकाओं का निर्माण करते हुए आगे बढता जाता है जो पदार्थ के विचरण के लिए जरुरी होता है। यदि धमाके के बाद ब्लैक होल का मलबा अंतरिक्ष मेँ फैलता तो उसे चलने के लिए उस का माध्यम अर्थात परमाणु कक्षिका नहीँ मिलती इसलिए प्रकाश पदार्थ की रफ़्तार से ज्यादा की रफ़्तार के साथ आगे बढ़ते हुए एक नये ब्रम्हांड के लिए क्षेत्र तैयार करता जाता है। इस प्रकार ब्रम्हांड के निर्माण के समय ही प्रकाश तथा पदार्थ की अधिकतम रफ्तार तय होती है यही कारण है कि पदार्थ कभी प्रकाश के रफ्तार के बराबर की रफ्तार से नहीँ चल सकता यह नियम सभी ब्रह्मांड पर लागू होता है।
प्रकाश प्रत्यक्ष दिशा मेआगे बढ़ते हुए ब्रम्हांड तैयार करता है ब्रम्हांड की आकृति ग्लोबाकार होती हैऔर समय के साथ ही इसका आकार बड़ा होता जाता है। हमारे ब्रम्हांड की उम्र करीब 13 अरब 80 करोड़ साल है इसके व्यास की लंबाई 27 अरब 60 करोड़ प्रकाश वर्ष है जिसमेँ प्रति सेकेंड 5 लाख 99 हजार 584 किलोमीटर की बढ़ोतरी हो रही है जो कि ब्रम्हांड के प्रकाश की एक सेकेंड मेँ तय की गई दूरी का दो गुना है। जब कोई ब्लैक होल अपने ब्रम्हांड से अलग होकर धमाके के साथ फटता है तो उसी जगह पर दूसरे परिमाण मेँ अपना नया ब्रम्हांड बनाता है हमारे ब्रम्हांड मेँ ऐसे पदार्थ मौजूद है जो दिखाई नहीँ देते सिर्फ उनके गुरुत्व आकर्षण शक्ति का प्रभाव देखने को मिलता है ऐसे पदार्थोँ को डार्क मैटर कहते हैँ संभव है यह डार्क मैटर दूसरे परिमाण मेँ मौजूद वह दूसरे ब्रम्हांड हो जिसे हमारे ब्रम्हांड के किसी ब्लैक होल ने बनाया हो या फिर उन मेँ से किसी एक ब्रम्हांड ने हमारे ब्रम्हांड को बनाया हो।
जब कोई ब्लैक होल अपने आस पास के परमाणु कक्षिकाओं के साथ अपना ब्रम्हांड छोड़ता है तो वहाँ एक खाली जगह रह जाता है जहाँ परमाणु कक्षीकाऍ भी नहीँ होती यदि उस जगह से प्रकाश के गुजरने के बावजूद नयी परमाणु कक्षिकाओं का निर्माण नहीँ होता है और वह खाली जगह फिर से नहीँ भरती हैँ तो वह हमारे ब्रम्हांड मेँ बनी सुरंगे हो सकती है जो हमेँ दूसरे ब्रम्हांड मेँ ले जाए या इस सुरंग का दूसरा सिरा उस ब्रम्हांड से जुड़ा हो जो उसी ब्लैक होल से बनी हो जो किसी समय मेँ वहाँ पर मौजूद था इसलिए हमेँ अपने ब्रम्हांड के सभी ब्लैक होल्स के स्थान को अंकित करना चाहिए और उनके साथ हो रही घटनाओं पर नजर रखने चाहिए।
हर ब्रम्हांड का अंतरिक्ष मेँ एक सीमित क्षेत्र होता है ब्रम्हांड के पदार्थ इस क्षेत्र से बाहर नहीँ जा सकते यदि पदार्थ प्रकाश की रफ्तार से ज्यादा की रफ्तार से एक निश्चित दिशा मेँ आगे बढ़ता रहे तो एक समय ऐसा आएगा जब वह पदार्थ अपने ब्रम्हांड के तय क्षेत्र से बाहर चला जाएगा इसलिए पदार्थ कभी भी प्रकाश से ज्यादा की गति से नहीँ चल सकता यह बिल्कुल फुटबॉल के उसकी खेल की तरह है जिसमेँ सभी खिलाड़ियोँ को खेलने के लिए एक निश्चित क्षेत्र दिया जाता है यदि कोई खिलाड़ी फुटबॉल को उस तय क्षेत्र से बाहर फेंक देता है तो उसे इस खेल के नियम के विरुद्ध माना जाता है।

काल चक्र तथा काल यात्रा

Time cycle
काल चक्र : रहस्यमयी अंतरिक्ष की खोज
सभी ब्रम्हांड किसी दूसरे ब्रम्हांड के ब्लैक होल से बने होते हैँ पर यदि हर ब्रम्हांड किसी दूसरे ब्रम्हांड से ही बना है तो इसकी शुरुआत कहाँ से हुई होगी यदि हम मान लें की सबसे पहले अंतरिक्ष मेँ सिर्फ एक ब्रंहांड था जिससे फिर आगे चलकर कई दूसरे ब्रम्हांड बनते गए तो प्रश्न यह उठता है कि उस ब्रम्हांड को किसने बनाया? सबसे पहले हमेँ यह समझना होगा कि हर पदार्थ का कोई ना कोई स्त्रोत जरुर होता है कोई भी सिद्धांत यह सिद्ध नहीँ कर सकता कि कोई भी चीज बिना किसी स्तोत्र के भी बन सकती है यदि कोई चीज़ किसी स्थान पर अचानक मौजूद हो भी जाती है तो उस चीज के वहाँ मौजूद होने से पहले उसका किसी और जगह पर जैसे कि उसी ब्रम्हांड मे दूसरी जगह, दूसरे ब्रम्हांड मेँ , या फिर दूसरे परिमाण मेँ मौजूद होना अनिवार्य है। इस स्थिती मेँ समय की कोई शुरुआत नहीँ हो सकती है इसका अर्थ है कि यह अनंत समय से चलता आ रहा है और अनंत समय तक चलता रहेगा।
"जो चीज़ अनन्त होती है वो कहीँ न कहीँ और किसी न किसी तरीके से स्वयं से जुङी होती है॥"
इसे हम इस तरह से समझ सकते हैँ मान लीजिए अंतरिक्ष मेँ एक जगह पर एक ब्लैक होल मौजूद है इसमेँ धमाका होता है इसे हम "big bang 1" नाम दे देते हैँ धमाके के बाद यह एक ब्रम्हांड बनाता है इसमेँ तारे, ग्रह, आकाशी पिंड और कई सारे ब्लैक होल्स के अलावा ब्रंहांड की दूसरी चीजेँ बनी इस ब्रम्हांड के किसी एक ब्लैक होल मेँ फिर धमाका होता है इसे हम "बिग बैंग 2" नाम दे देते हैँ धमाके के बाद यह अपना एक अलग ब्रह्मांड बनाता है इस ब्रम्हांड मेँ भी बहुत सारे ग्रह, तारे और बाकी की चीजेँ हैँ इस ब्रंहांड के कुछ तारे आगे चलकर ब्लैक होल बन जाते हैँ । इन मेँ से एक में पुनः विस्फोट होता है।इसे "बिग बैंग 3" नाम देते हैँ जाहिर है यह अपना एक और ब्रह्मांड बनाता है इसमेँ बाकी ब्रंहांड की तरह ग्रह, तारे, ब्लैक होल्स और दूसरी चीजें है इस ब्रंहांड के भी एक ब्लैक होल मेँ विस्फोट हो जाता है मगर इस बार हम इसे "बिग बैंग 4" का नाम नहीँ देंगे इस बार हुए धमाके का जिक्र पहले ही हो चुका है यह धमाका "बिग बैन्ग 1" हैँ ।इस प्रकार से कई ब्रम्हांड अपने आप से जुड़े होते हैं और इसके लिए समय काइस्तेमाल होता है।
Diagram of universe and blackholes
ब्रह्माण्ड तथा ब्लैकहोल्स का चित्रण
अंतरिक्ष मेँ मौजूद सभी ब्रह्माण्ड को तीन श्रेणीयोँ में बांटा जा सकता है -

  1. प्रथम श्रेणी के ब्रह्माण्ड - इनमेँ वह ब्रह्माण्ड आते हैँ जो अपने आप से समय के माध्यम से जुड़े होते हैँ ।
  2. द्वितीय श्रेणी के ब्रह्माण्ड - इनमेँ वह ब्रह्मांड आते हैँ जिनका निर्माण प्रथम श्रेणी के ब्रह्माण्ड करते हैँ ।
  3. तृतीय श्रेणी के ब्रह्मांड - द्वीतीय श्रेणी के ब्रह्माण्ड से बने नए ब्रह्मांड,और आगे चलकर इनसे जितने भी ब्रह्मांड बनते हैं व सभी इस श्रेणी में आते हैं।


यहाँ इस चित्र मेँ बड़े वृत्त के अंदर छोटे वृत्त है बड़े वृत्त ब्रम्हांड को तथा उसके अंदर बने छोटे वृत्त उस ब्रम्हांड के ब्लैक होल को दर्शाते है यहाँ पर जिस ब्रम्हांड और ब्लैक होल के नाम समान है वे यह दर्शाती है कि उसी ब्लैक होल ने उस ब्रम्हांड को बनाया है जैसे कि ब्रम्हांड C मेँ ब्लैक होल A मौजूद है और एक अन्य ब्रम्हांड का भी नाम A है अर्थात ब्रंहांड C के ब्लैक होल A ने ब्रम्हांड A को बनाया है ।यहाँ जो ब्रह्मांड Random हैँ वे एक अज्ञात नए ब्रम्हांड की रचना करने वाले है। इस चित्र के माध्यम से अंतरिक्ष मेँ मौजूद सभी ब्रह्मांड के निर्माता ब्रम्हांड का पता चल जाता है।
Time travel
काल यात्रा : रहस्यमयी अंतरिक्ष की खोज
तेज रफ्तार से बदल रहे हैँ फ्रेम वाले ब्रम्हांड का समय धीमी रफ्तार से बदल रहे फ्रेम वाले ब्रंहांड के समय की अपेक्षा भविष्य की और बढ़ता जाता है जबकि धीमी रफ्तार से बदल रहे फ्रेम वाले ब्रम्हांड का समय भूत काल की और बढ़ता जाता है अर्थात वे ब्रम्हांड जिनमेँ समय के फ्रेम बदलने की रफ्तार समान नहीँ हैँ वह सभी एक दूसरे की तुलना मेँ समय मेँ आगे या पीछे की और बढते रहते हैँ जिसके कारण ही प्रथम श्रेणी के ब्रंहांड के समय चक्र का पूरा होना संभव हो पाता है ऐसे ब्रंहांड बिल्कुल उन दो रेल गाड़ियोँ के समान है जो एक दूसरे की बगल वाली पटरी पर एक दूसरे के विपरीत दिशा मैँ एक दूसरे को पार करते हुए आगे बढ़ते हैँ यहाँ दोनोँ रेलगाड़ियाँ अपनी सीधी दिशा मेँ आगे बढ़ रही है जो यह दर्शाता है कि अपने ब्रम्हांड का समय आगे ही बढ़ रहा है मगर एक दूसरे के विपरीत दिशा मेँ आगे बढ़ना यह दर्शाता है कि दो ब्रम्हांड का समय एक दूसरे के समय की तुलना मेँ विपरीत दिशा मेँ आगे बढ़ता है।
चूकी प्रथम श्रेणी के ब्रह्मांड आपस मेँ समय के माध्यम से जुड़े होते हैँ और यह एक निश्चित समय मेँ अपना एक चक्र पूरा कर लेते हैँ इसका अर्थ है कि इसकी ना तो कोई शुरुआत है और ना ही कोई अंत यह समय चक्र अनंत समय से चलता आ रहा है और अनंत समय तक चलता रहेगा इन निश्चित समय मेँ हुई घटनाऍ अपने आप को बार बार दोहराती रहती है ।यदि हम यह मान लें कि यह समय चक्र 50 अरब वर्ष मेँ पूरा होता है तो इन ब्रम्हांड मेँ इस समय अंतराल के बीच हुई कोई भी घटना अनंत काल से पिछले हर 50 अरब साल के अंतराल पर दोहराई जा रही है और आने वाले अनंत समय तक हर 50 अरब साल के अंतराल पर यह घटनाए दोहराई जाती रहेंगी,ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार दो आईनो को एक दूसरे के सम्मुख खड़ा कर देने पर दोनोँ आइनोँ मेँ एक दूसरे के प्रतिबिंब अनंत बार बनेंगे।
दो ब्रम्हांड समय मेँ एक दूसरे से आगे और पीछे ही जाएंगे इसलिए समय के चक्र को पूरा करने के लिए प्रथम श्रेणी के ब्रम्हांड की संख्या कम से कम तीन होनी चाहिए इनकी संख्या तीन से ज्यादा भी हो सकती है।
Speed of Time
समय की रफ्तार : रहस्यमयी अंतरिक्ष की खोज
क्या समय की रफ्तार तेज या धीमी हो सकती है ? जवाब है हाँ ! ब्रह्मांड में निश्चित समय में समय के फ्रेम्स बदलने की संख्या भी निश्चित होती है कोई वस्तु जितनी धीमी गति से विचरण करेगी उसके परमाणु एक ही परमाणु कक्षिका में उतने ही ज्यादा फ्रेम्स में उपस्थित रहेंगे पर यदि हम जैसे जैसे वस्तु की गति किसी एक दिशा में बढ़ाते जाएंगे वैसे वैसे उसके परमाणु अपना स्थान बदलते रहेंगे तथा एक परमाणु कक्षिका में कम समय के लिए ठहरेंगे । मान लीजिए कोई एक परमाणु 1 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से चल रहा है और एक सेकंड में 1 लाख परमाणु कक्षिकाओं से होकर गुजरता है तो इसकी गति अगर दो गुनी यानि 2 मीटर प्रति सेकंड कर दी जाए तो यह 1 सेकंड में 2 लाख परमाणु कक्षिकाओं से होकर गुजरेगा । इसी प्रकार हम गति बढ़ाते जाएं और यह अपने अधिकतम रफ़्तार के बेहद करीब पहुंच जाए तब अगर उसी रफ्तार पर इसकी दिशा 90° कोण से कम पर मोङेंगें तो इसे अपनी रफ्तार में इजाफा करना होगा क्योंकि यह अधिकतम सीमा के बेहद करीब है इसलिए इसका हिलना डुलना धीमा हो जाएगा जिसका मतलब है इसके समय की रफ्तार धीमी हो जाएगी । मान लीजिए कोई परमाणु एक दिशा में प्रकाश की रफ्तार से सफर कर रही है यानी कि समय के एक फ्रेम में केवल एक ही परमाणु कक्षिका में ठहर रही है (वैसे ऐसा होना असंभव है क्योंकि यह प्रकाश की रफ्तार है) तो इसका हिलना डुलना बंद हो जाएगा और इसका समय रुक जाएगा । ऐसे में इसे इसी दिशा में विचरण करने के साथ तथा अपनी दिशा बदलने या फिर यूं कहें कि हिलने-डुलने के लिए अपनी गति को कम करना ही होगा इस प्रकार गति अत्यधिक होने पर समय की रफ्तार कम हो जाती है । चूँकि तेज रफ्तार से सफर कर रहे व्यक्ति का समय धीमा हो जाता है अतः उसे बाकी चीजों का समय सामान्य से तेज प्रतीत होगा। मानव शरीर में रासायनिक क्रियाएं व मस्तिष्क में विद्युत संकेत के कारण हमारे शरीर के भीतर परमाणुओं की गति होती रहती है प्रकाश की रफ्तार के बेहद करीब से विचरण करने पर हमारे शरीर की आंतरिक क्रियाएं भी धीमी पड़ जाएंगी जिससे शरीर की कार्यप्रणाली ध्वस्त हो सकती है अतः प्रकाश की रफ्तार के बेहद करीबी रफ्तार पर सफर करने पर हमारी मौत हो जाएगी।

समस्त ब्रह्माण्ड के उभयनिष्ठ रंग

Universal common colours
समस्त ब्रह्माण्ड के उभयनिश्ठ रंग : रहस्यमयी अंतरिक्ष की खोज
अलग-अलग ब्रह्मांड में अलग-अलग रंग होते हैं, मगर सारे ब्रम्हांड मेँ दो चीज़े समान होती है ,अंतरिक्ष तथा प्रकाश ।इन दोनोँ का रंग क्रमशः काला तथा सफेद होता है अर्थात काला और सफेद दो ऐसे रंग हैँ जो सभी ब्रम्हांड मेँ पाए जाते हैँ हमारे ब्रम्हांड मेँ भी यह दो रंग पाए जाते हैँ जो कि इंद्रधनुष के सात रंगोँ मेँ से नहीँ हैँ ।दूसरे ब्रम्हांड मेँ काले तथा सफेद के अतिरिक्त रंगोँ की संख्या अनिश्चित होती है।

उपग्रहों की चाल

Satellites with celestial bodies
उपग्रहों की चाल : रहस्यमयी अंतरिक्ष की खोज
किसी ग्रह के चारोँ ओर चक्कर लगा रहे उसके उपग्रह के परिक्रमण पथ की दिशा सदैव उस के ग्रह के घुर्णन दिशा पर निर्भर करता है यदि कोई विशाल पिण्ड घड़ी की सुई की दिशा मेँ अपनी धुरी पर घूम रहा है तो उसका चक्कर लगा रहा छोटा पिंड भी अपने ग्रह के चारोँ ओर सुई की दिशा मेँ ही घूमेगा।गुरुत्वाकर्षण लास्टिक की तरह काम करता है मान लीजिए दो पिण्ड एक दूसरे की गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र मेँ है और अपनी धुरी पर नहीँ घूम रहे हैँ तो दोनोँ के गुरुत्वाकर्षण लहर आपस मेँ छू जाएंगे और एक लास्टिक की तरह बंध जाएंगे और जब लास्टिक सिकुङेगा तो शुरुआत मेँ धीरे धीरे यह एक दूसरे के करीब आते जाएंगे और आख़िर मेँ तेज गति से आपस मेँ टकरा जाएंगे मगर यदि उनमेँ से एक पिण्ड अपनी धुरी पर सुई की दिशा मेँ घूम रहा है और दूसरा उसके करीब आ रहा है तो लास्टिक भी करीब आ रहे हैँ पिण्ड को घड़ी के सुई की दिशा मेँ खींचेगा जिससे करीब आता पिण्ड भी घूमते पिण्ड से सिधा ना टकराकर उसके चारोँ ओर चक्कर लगाने लगेगा।
हमारे सौर मंडल के सभी ग्रह घड़ी की सुई की विपरीत दिशा मेँ सूर्य की परिक्रमा करते हैँ क्योंकि सूर्य भी इसी दिशा मेँ अपनी धुरी पर घूम रहा है । हमारी आकाशगंगा के सभी करोङों तारे आकाश गंगा के केंद्र मेँ मौजूद किसी पिंड के चारोँ ओर घङी के सुई की दिशा मेँ चक्कर लगाते हैँ अर्थात् आकाशगंगा के केंद्र मेँ मौजूद पिंड भी घड़ी के सूई की दिशा मेँ अपनी धुरी पर घूम रहा है यदि इस पिण्ड का घूमना रुक जाए तो सभी तारे आकाश गंगा के केंद्र मेँ इकट्ठे हो जाएंगे और आपस मेँ टकरा जाएंगे। कोई पिंड जितनी ज्यादा तेजी से अपनी धुरी पर घूमता है उससे दूसरे पिण्डों के टकराने की संभावना उतनी ही कम होती है। गुरुत्वाकर्षण के लास्टिक के समान व्यवहार करने के कारण ही सूर्य की परिक्रमा करते हुए उसके सभी ग्रह तस्तरी का आकार बनाते हैँ हैली का धूमकेतू भी हमारे सौर मंडल मेँ मौजूद है और सूर्य का चक्कर लगाती है इसका परिक्रमा मार्ग सौर मंडल के छोर पर काफी झुका हुआ है यह सूर्य के काफी क़रीब से उसका चक्कर लगाते हुए सौर मंडल के छोर तक जाती है और सूर्य की गुरुत्व आकर्षण शक्ति के कारण वापस उसी की ओर बढ़ती है सूर्य के नजदीक पहुंच जाने के बाद सूर्य के घुर्णन के कारण उससे सीधा ना टकरा कर उसका चक्कर लगाती है सूर्य के बेहद नजदीक आ जाने के कारण इसकी रफ्तार बहुत ज्यादा बढ़ जाती है तब सूर्य इसे बेहद तेज रफ्तार के साथ बाहर की और फेंकता है तथा सभी ग्रहो की परिक्रमण पथ के काफी नीचे से होता हुआ यह सौर मंडल के छोर तक पहुंच जाता है जिस कारण यह किसी ग्रह से टकराता नहीँ है इस प्रकार यह अपना एक परिक्रमा 76 वर्षों मेँ पूरा करता है समय के साथ साथ हैली का धूमकेतु सौर मंडल मेँ सूर्य की परिक्रमा करते हुए जब जब सूर्य के नजदीक से होकर गुजरेंगा इस की परिक्रमा का पथ सूर्य की सीध मेँ आता जाएगा क्योंकि यह सभी ग्रहो की परिक्रमा के पथ से होता हुआ गुजरता है इसलिए भविष्य मेँ इसके सौर मंडल के ग्रहोँ से टकराने की संभावना बढ़ती जाएगी।

ग्रहों का झुकाव

Earth Planet Angle
ग्रहों का झुकाव : रहस्यमयी अंतरिक्ष की खोज
किसी तारे का चक्कर लगा रहे एक आकाशीय पिण्ड मेँ तीन प्रकार की गति होती है परिक्रमण, परिभ्रमण तथा झुकाव।
कोई पिण्ड एक निश्चित समय मेँ एक परिक्रमण तथा परिक्रमण पूरा करता है उसी प्रकार पिंड समान गति से झुकते हुए तय समय मेँ एक निश्चित कोण पर पहुंच जाता है। पृथ्वी 13.5° के कोण पर झुकी हुई है और यह घड़ी घङी के सुई की विपरीत दिशा(वामावर्त) मे अपनी धुरी पर घूम रही है जिस कारण पृथ्वी पर सूर्योदय पूर्व से तथा सूर्यास्त पश्चिम में होता है। यदि यह निरंतर झुकता चला जाए तो एक समय ऐसा आएगा जब यह 90° के कोण पर पहुंच जाएगा 90° से ज्यादा झुकने पर पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव दक्षिणी ध्रुव मेँ तथा दक्षिणी ध्रुव उत्तरी ध्रुव मेँ परिवर्तित हो जाएगा जिससे यह घड़ी की सुई की दिशा (दक्षिणावर्त) मेँ घूमने लगेगा तब पृथ्वी पर सूर्योदय पश्चिम से तथा सूर्यास्त पूर्व में होना शुरू हो जाएगा। 180° के कोण तक झुक जाने पर सूर्य ठीक भूमध्य रेखा के ऊपर से होकर पश्चिम दिशा से पूर्व दिशा मेँ आगे बढ़ेगा। सूर्य का पश्चिम से उगना और पूर्व मेँ ढलना पृथ्वी के 270° के कोण तक पहुंचने से पहले तक जारी रहेगा। हमारे सौर मंडल के ग्रह शुक्र पर सूर्योदय पश्चिम से तथा सूर्यास्त पूर्व मेँ होता है संभव है शुक्र ग्रह के साथ भी यही घटना हुई हो।

पृथ्वी का चुम्बकत्व गुण

Magnetic qualuty of earth
पृथ्वी का चुम्बकत्व गुण : रहस्यमयी अंतरिक्ष की खोज
हमारी पृथ्वी मेँ चुंबकत्व गुण पाए जाते हैँ जिसके 'N' तथा 'S' दो सिरे होते हैँ ।पृथ्वी एक चुंबकीय क्षेत्र बनाती है जो एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव की ओर प्रवाहित होती है इसी कारण कंपास की सुई हमेशा उत्तर दक्षिण दिशा मेँ ही रुकती है । इस तरह का व्यवहार उन ग्रहों मेँ भी होता है जिनका आंतरिक भाग तरल अवस्था मेँ हो ।पृथ्वी का भी आंतरिक भाग तरल है तथा ऊपरी पर जो कि बहुत पतला है ,ठोस है। जब ऐसे ग्रह अपनी धुरी पर गोल-गोल घूमते हैँ तो अंदर का तरल पदार्थ भी बेलनाकार रुप ले कर घूमने लगता है जैसे की पानी को ग्लास मेँ चम्मच की सहायता से गोल-गोल घुमाया जाता है । पृथ्वी करीब 4 अरब 54 करोङ वर्ष पुरानी है तब से अब तक इसने घूमते हुए कम से कम 16.5 खरब चक्कर पूरे कर लिए हैँ जिससे इसके भीतर के द्रव्य ने बेलनाकार रुप ग्रहण कर लिया है । पृथ्वी के भीतर इसी आकार के द्रव्य की मौजूदगी, पृथ्वी के चुम्बकत्व गुण का कारण है। अर्थात जो पिण्ड भीतर से तरल अवस्था मेँ हो, तथा अपनी धुरी पर घूमते होँ ,उनमेँ सदैव समय के साथ चुम्बकीय गुण आ जाएंगे जिन का सिरा सदैव ध्रुवों की ओर होगा।

उल्कापिण्ड तथा हमारी पृथ्वी

Meteoroids and earth
उल्कापिण्ड तथा हमारी पृथ्वी : रहस्यमयी अंतरिक्ष की खोज
हमारे सौर मंडल के निर्माण के समय जो मलबे ग्रह या उपग्रह नहीँ बन पाए थे वह क्षुद्र ग्रहों तथा उल्का पिंडों के रुप मेँ सूर्य के गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण अब भी सौर मंडल मेँ मौजूद है और यहाँ वहाँ पर तेज गति से विचरण करते हैँ। इनमे से कुछ ग्रहो तथा उपग्रह से टकराकर उनका हिस्सा बन जाते हैँ इनमेँ हमारा ग्रह भी शामिल है जिस पर वायुमंडल मौजूद है। सौर मंडल मेँ मौजूद इन अवशेषों का बेहद तेज रफ्तार होना अनिवार्य भी है जब कोई तेज रफ्तार उल्का पिंड हमारे ग्रह के वायुमंडल मेँ प्रवेश करता है तो घर्षण के कारण इस से इतनी ऊष्मा उत्पन्न होती है कि यह पहले पिघलता है फिर भाप बनकर पृथ्वी की सतह पर पहुंचने से पहले ही वायुमंडल मेँ घुल जाता है। ज्यादातर छोटे उल्कापिण्ड वायुमंडल मेँ ही नष्ट हो जाते हैँ जबकि कुछ ही बड़े आकार के उल्कापिण्ड पृथ्वी की सतह से टकराते है जो कि सतह तक पहुंचते पहुंचते अपने मूल आकार से काफी छोटे हो चुके होते हैँ इसमेँ उल्का इनकी रफ्तार अहम है क्योंकि यह धीमी गति से पृथ्वी के वायुमंडल मेँ प्रवेश करेँ तो यह इतना घर्षण उत्पन्न नहीँ कर पाएंगे
कि यह गर्म हो कर भाप बन जाए तब पृथ्वी पर बड़ी संख्या मेँ उल्का पिंड गिरते और इस पर बसे जीवन के लिए खतरा पैदा हो जाता। हमारा सौर मंडल करीब 4 अरब 60 करोङ वर्ष पुराना है। बड़े पिण्डोँ से टकराते हुए उल्का पिंड वर्षोँ से उनका हिस्सा बनते रहे हैँ अर्थात भविष्य मेँ इनकी संख्या घटती जाएगी जिससे भविष्य मेँ उल्का पिंड के सतह पर गिर कर जीवन को नुकसान पहुँचाने के मामले में हमारी पृथ्वी ज़्यादा सुरक्षित होती जाएगी।

अन्य ग्रहों पर जीवन की संभावना तथा उसका स्वरूप

Life on exoplanets
अन्य ग्रहों पर जीवन की सम्भावना तथा उसका स्वरूप : रहस्यमयी अंतरिक्ष की खोज
किसी पिण्ड पर जीवन की उत्पत्ति के लिए पानी का तरल अवस्था मेँ होना आवश्यक है हमारी पृथ्वी पर जीवन करोड़ों साल पहले पनप चुका है तथा इसने अब तक स्वयं मेँ निरंतर विकास और सुधार किए हैँ मगर यह जरुरी नहीँ कि संपूर्ण ब्रम्हांड मेँ सिर्फ यहीं जीवन मौजूद है। हमारी आकाशगंगा के दूसरे तारे का चक्कर लगा रहे ग्रहों तथा अंय मंदाकिनी मेँ भी जीवन मौजूद होने की पूरी संभावना है। जीवन का विकास दर आसपास के वातावरण पर निर्भर करता है कुछ ग्रहो पर जीवन केवल सूक्ष्मजीव के रुप मेँ पनपा होगा तो कहीँ पर जीवन पानी से बाहर निकल कर जमीन पर आया होगा और यदि इस नें जमीन पर आने के बाद भी स्वयं मेँ निरंतर विकास किए होंगे तो वह हवा मेँ भी उड़ सकते होंगे । जिन ग्रहों की गुरुत्वाकर्षण शक्ति बहुत ज्यादा होती होगी वहाँ पर रहने वाले जमीनी जीव आकर मैँ ज्यादा बङे और ज्यादा ऊँचे नहीँ होते होंगे और उनमेँ से ज्यादातर जीवों के पैर मोटे और चपटे होते होंगे जबकि काफी कम गुरुत्व आकर्षण शक्ति वाले ग्रहों पर आकार मेँ बहुत विशाल और ऊँचे जमीनी तथा उड़ने वाले जीव ज्यादा पाए जाते होंगे।ऐसे ग्रहों पर उछल- उछल कर चलने वाले जीवों की संख्या भी ज्यादा होगी।

मानव प्रजाति का दूसरे ग्रहों पर प्रस्थान

Astronaut says good bye to earth
मानव प्रजाति का दूसरे ग्रहों पर प्रस्थान : रहस्यमयी अंतरिक्ष की खोज
अब से यदि पृथ्वी पर कोई बड़े पैमाने पर विशालकाय उल्कापिण्ड के गिरने जैसी प्राकृतिक आपदा आती है तो इंसानों की ज्यादातर आबादी और उनके द्वारा विकसित की गई अब तक की तकनीकी उपलब्धियाँ नष्ट हो जाएगी और फिर बाकी बचे इंसानों को शून्य से शुरुआत करना पड़ेगा। इंसानो की प्रजाति और उनकी अब तक की उपलब्धियोँ को बचाए रखने के लिए इंसान को बसाने लायक अनुकूल वातावरण वाले दूसरे तारोँ का चक्कर लगा रहे ग्रहों की तलाश करनी होगी और उन पर मानव सभ्यता को बसाना होगा। इस प्रकार इंसान कई ग्रहों पर फैलते जाएंगे और यदि उनमें से किसी एक ग्रह पर किसी प्राकृतिक आपदा के कारण पूरी मानव सभ्यता खत्म भी हो जाती है तो अंय ग्रहोँ पर इंसान और उनकी उपलब्धियाँ बची रहेंगी। इंसान के दूसरे ग्रहों पर बसने का एक और लाभ है ,पृथ्वी पर इन की आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है जिससे जंगल के काटे जाने और प्रदूषण जैसे घटनाओं के कारण पृथ्वी को इंसानो से खतरा भी बढ़ गया है ,मानव प्रजाति के अंय ग्रहों पर विस्तार से अत्यधिक जनसंख्या तथा पृथ्वी पर मंडरा रहे खतरो मेँ कमी आ जाएगी।

इंसान : एक विकसित प्राणी
Human Telepathy
इंसान : एक विकसित प्राणी : रहस्यमयी अंतरिक्ष की खोज
पृथ्वी पर इंसान सबसे विकसित जीव है इसका कारण यह है कि इंसान ने अब तक स्वयं को सीमित नहीँ किया है और नए प्रयोग करते हुए और उन के अनुसार ढलते हुए खुद मेँ निरंतर बदलाव किये है । पृथ्वी के अंय कई जीव जैसे कि मगरमच्छ, साँप तथा शार्क मेँ हजारोँ साल से कोई बदलाव नहीँ आया है क्योंकि इन जीवों नें स्वयं को सीमित कर लिया है ।यह शिकार करने तथा भोजन तलाशने जैसे कामोँ के लिए पीढी दर पीढी एक ही तरीका अपनाते आ रहे है और इसके अलावा यह अपने जीवन मेँ कुछ नया नहीँ करते हैँ जिसके कारण इनके शारीरिक तथा मानसिक संरचना मेँ कोई बदलाव नहीँ हुए है।

एक विकसित जीव होने की विशेषताएं:-

  • किसी जीव को मानसिक तौर पर अधिक विकसित होने के लिए एक ऐसे अंग का होना आवश्यक है जिसका कार्य निर्धारित तथा सीमित न हो साथ ही स्वतंत्र रुप से कार्य कर सकने मेँ सक्षम हो। जिस प्रकार इंसान के पास एक स्वतंत्र अंग हाथ है । पीढ़ियों से मनुष्य हाथ से नए नए क्रिया कलाप करता आया है जिसके अनुसार ही मानव मस्तिष्क इस स्तर तक विकसित हो पाया है ।
  • किसी जीव द्वारा नए आविष्कार और तकनीकोँ को जाद करने के लिए पानी से बाहर जमीन पर होना जरुरी है क्योंकि पानी के भीतर का वातावरण इसके लिए अनुकूल नहीँ होता है ।यदि ऐसे जीव उड़ते हो तो विकास क्रम के दौरान उनके हाथो का पंखोँ मेँ रुपांतरण होने के बजाए हाथों के अलावा उड़ने के लिए पंखोँ का अलग से विकसित होना जरुरी है।
  • यदि कोई जीव आसमान की तरफ आसानी से देख सकता हो तो सूर्य तारो तथा अंतरिक्ष को समझने के लिए उसके मस्तिष्क का विकास ज्यादा जल्दी और अलग तरीके से होगा इसके लिये ऐसे जीवो का पिछले पैरो कि सहारे खङे होना जरुरी है।
  • ऐसे जीवोँ का सामाजिक होना जरुरी है सामाजिक जीव समूह बनाकर रहते हैँ और उनमेँ आपस मेँ एक दूसरे सदस्योँ के प्रति सहयोग की भावना होती है जो एक जीव द्वारा इजाज की गई तकनीकोँ अन्य जीवो तक पहुंचाने मेँ सहायक होती है ।यदि कोई एकांकी जीव कोई तकनीक विकसित करता है तो बाकी जिवों से अलग होने के कारण उस प्रजाति के अंय जीव उस नई तकनीक से वंचित रह जाएंगे इस प्रकार उन जीवोँ के मानसिक विकास के लिए किसी नई तकनीक का अभाव निरंतर बना रहेगा।
  • एक अति विकसित जीव का मस्तिष्क भी आकार मेँ काफी बड़ा होता है इसलिए ऐसे जीवों का शरीर भी मध्यम या विशाल आकार का होना चाहिए जिसमेँ एक बड़े मस्तिष्क के सामाने लायक क्षमता हो।

मानव प्रजाति मेँ निरंतर विकास होते आ रहे हैँ और लगातार नए-नए क्रिया कलापों तथा आविष्कारों के संपर्क मेँ बने रहने के कारण मानव मस्तिष्क मेँ विकास जारी है ।संभव है जब एक ऐसा समय आएगा जब इंसान का मस्तिष्क इतना विकसित हो जाएगा कि वह आपस मेँ मस्तिष्क के माध्यम से विद्युत संकेत भेज कर संपर्क स्थापित कर सके, मस्तिष्क की शक्ति से ही बिना हाथ लगाए किसी वस्तु को हिला सके तथा किसी के दिमाग पर काबू कर सकेँ इसके अलावा वे चेहरे के कुछ नए भाव की इजाद कर सकेंगे। इसमेँ लाखोँ वर्षों का समय लग सकता है तब तक इंसान का मस्तिष्क भी अब से काफी बड़ा हो चुका होगा और समय के साथ इंसान के विकास दर की गति मेँ भी निरंतर वृद्धि होती जाएगी।

मानव व्यवहार

Human Behaviour
मानव व्यवहार : रहस्यमयी अंतरिक्ष की खोज
आज से करीब 30 हजार वर्ष पूर्व इंसानो नें खेती करना सीख लिया था जिसके बाद उनका जीवन पहले से आसान हो गया। खेती के माध्यम से भोजन मिल जाने के कारण उनका जंगलोँ मेँ जोखिम उठाकर जंगली तथा खतरनाक जानवरोँ का शिकार करना अनिवार्य नहीँ रह गया था इससे उनके जंगली जीवों द्वारा शिकार बन जाने का खतरा भी कम हो गया था। इसके बाद मानव जीवन मेँ तेजी से सुधार होने लगे।
मगर उससे पहले मानव जीवन काफी कठिन हुआ करता था मानव समूह को एक ही स्थान पर भोजन के स्त्रोत उपलब्ध नहीँ होने के कारण जंगलोँ मेँ भटकना पड़ता था और कहीँ ठहरने के लिए अलग- अलग जगहोँ पर अनिश्चित समय के लिए ठिकानों का निर्माण करना पड़ता था। परिस्थितियों के अनुसार इंसान ढलता गया और उसने अनेक व्यवहार स्वयं मेँ विकसित कियें। आज इंसान जंगली जीवन से बाहर आकर शहरोँ मेँ तो बस गया है पर आज भी अनेक व्यवहार इंसानों में देखने को मिलते हैं जो उनके DNA में मौजूद है और उसे जंगली जीवन से जोड़ते हैं।
  • जंगल के दिनोँ मेँ मानव बड़े-बड़े समूह मेँ रहते थे वे ठहरने के लिए एक ऐसे क्षेत्र का चुनाव करते थे जो उनके सुविधाओं के अनुसार हो जैसे कि उनके रहने के ठिकाने के पास एक पानी के स्त्रोत का होना, एक खुला क्षेत्र जहाँ बिच्छू, चीटियोँ जैसे कई छोटे जमीनी जीवों से बचा जा सके इत्यादि। ऐसे क्षेत्र को ढूंढना या उनका निर्माण करना काफी मुश्किल होता था और ऐसे क्षेत्र को पाने के लिए या उसकी सुरक्षा के लिए दो मानव समूह अक्सर एक दूसरे के प्रति आक्रामक हो जाया करते थें।इस प्रकार इंसान जंगल के दिनोँ मेँ एक इलाके के लिए-एक दूसरे से संघर्ष किया करते थें।यह प्रवृत्ति वर्तमान समय मेँ भी इंसानों मेँ देखने को मिलती है आज भी इंसान जमीन के लिए एक दूसरे से संघर्ष करते हैँ और ज्यादा से ज्यादा जमीन अपने नाम करना चाहते हैँ।
  • आज जब इंसान बिल्कुल अंधेरे मेँ होता है तो वह काफी असुरक्षित अनुभव करता है और उसे लगता है कि कोई उस पर हमला कर सकता है। जंगल के दिनोँ मेँ जब इंसान रात के वक्त शिकार पर निकलता था तो जंगली जानवर अक्सर उस पर घात लगाकर पीछे से हमला कर देते थें इसलिए आज भी जब इंसान अंधेरे मेँ होता है तो उसकी इंद्रियाँ चौकन्नीहो जाती हैं।
  • आज के समय मेँ इंसान जब अंधेरी बंद जगह मेँ प्रवेश करता हुआ उसके अंदर जाता है तो उसे काफी घबराहट और घुटन महसूस होती है। जंगल के दिनोँ मेँ इंसान गुफाओं से होते हुए उनके दूसरे मुहाने तक जाते थे जो उन्हेँ अक्सर पानी के स्त्रोत तक ले जाती थीं। गुफाओं का रास्ता बहुत जोखिम भरा और कहीँ-कहीँ पर बहुत सकरा होता था। कभी-कभी गुफाओं की नीचे की तरफ गई सकरी सुरंगोँ से नीचे उतरने के बाद ऊपर चढ़ कर वापस आना संभव नहीँ हो पाता था इससे पता चलता है कि गुफाएँ कितनी खतरनाक साबित हो सकती हैं।इस कारण गुफाओं जैसी जगह पर जाते वक्त हम आज भी असहज महसूस करते हैँ।
  • जंगल के दिनोँ मेँ पुरुष समूह बनाकर शिकार पर निकलते थे और आपस मेँ बेहतर ढंग से तालमेल और रणनीति बनाकर काम करते थे आधुनिक जीवन मेँ भी पुरुषोँ मेँ घनिष्ठ संबंध देखने को मिलता है और यदि किसी एक पुरुष को किसी बाहरी व्यक्ति से खतरे का संकेत मिलता है तो उसके सभी पुरुष साथी एकजुट होकर युद्ध के लिए तैयार हो जाते हैँ।इसके विपरीत महिलाओं का आपस मेँ अच्छा तालमेल देखने को कम मिलता है।

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